Wednesday, September 11, 2013

उलझन सुलझे ना रस्ता सूझे ना


ये महानगर ये इसकी रफ़्तार और ट्रैफिक ......एक घंटे पहुँचने वाली जगहों पर तीन घंटे में पहुँचों। इन सब के चलते कभी-कभी जब जीवन की गणित गड़बड़ा जाती है तो बहुत बेचैनी होने लगती है। मन कहीं टिकता ही नहीं, मतलब ठिकाने पर नहीं रह जाता।

"कामरेड तुम्हारे साथ होता है ऐसा?" 

" मेरे ख़याल से तो सभी के साथ होता है"

"मेरी तो जुबां भी उलझने लगती है, पता नहीं क्या बोल रही होतीं हूँ और लिखे हुए शब्द गिबरिश"

"अब ये क्या होता है?"

"क्या पता, कहा न कुछ नहीं..... मालूम नहीं क्यों हो जाता है ऐसा"

"वैसे ये तुम्हारी तरह तुम्हारा बेसिर -पैर का लेखन कोई तो विधा हो "

" एक मित्र ने कहा इसे गद्य गीत कह देते हैं, कोमरेड तुम्हे कुछ समझ आए तो ठीक वरना चुप बैठो उधर"

"……"

" अब क्या पढने आ गए इधर?"

"ये ही तुम्हारा आड़ा -टेढ़ा, जो भी लिखा है, वरना कहोगे कट्टी हूँ "

" ह्म्म्म…कोई नहीं आज ऐसा ही पढ़ लो, जब तुम्हारा गणित उलझेगा तुम भी तो ऐसा ही लिखोगे तब मैं भी तो पढने आउंगी"

"अब ज़रा देखूं तो कौन सा भूत लगा है मुझे"

कहते हैं हर भूत को उतारने का एक न एक मंतर जरूर होता है...........


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