Sunday, February 10, 2013

जंगल में खिलता बसंत Whispering Springs ( 2013 )


" क्या सोच रहे हो ?"
"सोच रही हूँ तुझे इस पहाड़ी से नीचे धकेल दूँ। "
"फिर ......देर किस बात की है ?"
" तू पका मत, वैसे ही बहुत दिनों से दीमाग खाली-खाली लग रहा है। अब तू जा। मुझे आज कोई बात करने का मन नहीं है। "
" अच्छा है, वर्ना तुम्हारा ये शैतानी दीमाग न खुद चैन से रहता है न किसी दूसरे को बैठने देता है। "

"..........."

" तुम मुझसे उम्र में छोटी हो फिर भी मैं आदर से बोलता हूँ और तुम मुझे तू क्यूँ कहती हो ?"
"बोला ना तुझे तू जा और मेरा पीछा छोड़। "
"अच्छा ऐसे सोचो जैसे मैं यहाँ पर हूँ ही नहीं। मैं भी चुपचाप 'आर्ग्युमेंटेटिव इंडिया' पढ़ते हुए अमर्त्य सेन को गलत और तुम्हें सही साबित करने की कोशिश करता हूँ ...ठीक है ?"
" नहीं .......बिलकुल भी नहीं। अब तू मिचमिच मत कर। मुझे अकेले छोड़ दे। "

"जब देखो एकांत तलाशती हो। तुम तो जंगल में चले जाओ, बहुत दूर .....वहां जाकर भटक जाओ और फिर कभी वापस ही मत आओ। अब ठीक है ?"

"ओए सच्च .....कभी -कभी तू इतनी अच्छी बात कैसे कर देता है ? कुछ हफ़्तों से दिल मरा हुआ था, अब जंगल का नाम सुनकर जिंदा हुआ है। चल उठ .....झटपट ....चलते हैं। "

"............"

" क्या ?......चल अब "

"जंगली फूलों की खुश्बू , मिट्टी और घास की भीगी सोंधी महक और पेड़ों से छनकर आती सुनहरी धूप की तपिश से खिलते हुए बसंत को देखेंगे। कुछ कच्ची और सच्ची कहानियां और कविताएं लिखेंगे। अब उठ ना  चल जल्दी ....."

"ये शहर भागते रहतें हैं, इन्हें फुर्सत नहीं होती बसंत देखने की, इसलिए यहाँ बसंत नहीं खिलता ....."

HAPPY BASANT २०१३ !!


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