Friday, October 5, 2012

तुम्हारे शब्दों का उधार है मुझ पर


पिछले दिनों जब नैनीताल गई थी, मालूम हुआ लता वहीं कालेज में लेक्चरार है। पांचवीं कक्षा से दसवीं तक साथ पढ़ा हमने..वो मुझे इसलिए भी याद रही की इस दुनिया में वो उन विशेष लोगों में से है जो जीते ही बोलने के लिए हैं। वो कहा करती थी - " पता नहीं  लोग चुप कैसे बैठ जातें हैं, मैं तो ना बैठूं एक पल के लिए भी " 


सहेलियां उससे कतरातीं थीं और मुझे वो साफदिल, बेहद बातूनी लड़की बहुत पसंद थी। इतना कुछ होता था उसके पास बोलने के लिए कि सुबह से शाम हो जाए। सामान गेस्ट हाउस में रखवा कर मैं प्रेमबल्लभ को आवाज देतीं हूँ। 

" भाईजी डिग्री कालेज में ज़ुलोजी डिपार्टमेंट में लतिका सती नाम की लेक्चरार हैं क्या ?"  

"जी मैडम हैं,  आजकल वो हेड ऑफ़ डिपार्टमेंट हैं।" 

"उनसे कहना मैंने बुलाया है। शाम को यहीं आ जाएंगी, ये उन्हें मेरा कार्ड दे देना।" लता मेरे बदले हुए सर नेम की वजह से मुझे पहचान नहीं सकी।पहचान तो मैं भी कहाँ सकी थी उसे, अब वो सुन्दर सी गोल-मटोल भद्र महिला जो बन चुकी थीं। थोड़ा बहुत औपचारिक बातों के बाद मैं उसे अपना बचपन का परिचय दे ही देतीं हूँ। बस....फिर लतिका भावुक होती, हंसती रोती वही बचपन की लता बन जाती है। 

"हाइईए रे तू कितना बदल गई है, मैं तो तुझे पहचान ही नहीं सकी। मेरे बारे में कैसे पता......इतने वर्षों में......तुझे याद है ....."

"..................."

"अब देख मैं ही फिर से शुरू हो गई। यार तूने मुझे बहुत सुना है... आज तू बोल...."

"तू क्या बोलेगी, अच्छा सुन वो मंजू थी ना, मोटी, मंजू नेगी.....जो अक्सर प्ले मैं हमारी माँ का रोल करती थी...उसका पति भी मेरे साथ कालेज में ही है। मिलती रहती है वो मुझे। अब भी वैसी ही......कुछ आदतें बिलकुल नहीं बदलती ना ?"

"..............."

"और पता जब तू चली गई थी.....वो तेरा.....नालायक कितना दिमाग खराब करता था। याद है.......और अपनी अविवाहित प्रिन्सी...हिटलर थी पूरी न?" तभी उसे खांसी का हल्का धस्का आ जाता है। मैंने मुस्कुरा कर प्रेमबल्लभ को उसे पानी देने के लिए इशारा किया। ग्लास हाथ में ही थामे बिना पानी पिए वो फिर से शुरू हो जाती है। "अब ज्यादा नहीं बोल पाती हूँ यार। कालेज, स्टुडेंट, घर-बाहर सब सँभालते थकने लगी हूँ।"

"मेरा बेटा एन डी ऐ सेलेक्ट हो गया और बेटी दसवीं में है। पति डियर.....अरे तू तो बता...तेरे बच्चे.....तेरे मिस्टर....शादी के नाम से तू कितना घबराती थी। अब बोल.....सुना था तब....महाशय बेहद रोमांटिक हैं....बता ना.....तुम दोनों...." तभी घड़ी शाम के आठ बजाती है। 

"चल यार बहुत बोल -सुन लिया आज। अब चलती हूँ। तू कल दिन में अपने सारे ऑफिशल काम निपटा लेना। शाम को मैं तुझे लेने आ जाउंगी। फिर अगले दो दिन शनिवार,इतवार....सिर्फ हम दोनों के लिए। दिन भर घूमेंगे और रात भर ढेरों गपशप करेंगे। कह दूंगी मैं सब से, संजय से भी, उसे ड्राइंग रूम में सोना होगा। हमें कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा। अरे मैं तो तुझसे पूछना ही भूल गई। तू खाना क्या.....चल छोड़....देख कर ही पता लग रहा है। तुझे मैं दूध और केलॉग ही खिलाउंगी......मंजू से भी मिलेंगे।"

पता नहीं कहाँ से उसके पास इतना स्टेमिना और शब्द आते हैं। यही वो आदत है उसकी, जिसकी वजह से मैं उसे बेहद पसंद करती हूँ और आज भी फिर से उस पर बहुत-बहुत प्यार आ रहा था। बचपन की उस खिड़की को खोलने के लिए, जिसे वर्षों पहले पता नहीं धीरे-धीरे वक्त के साथ मैंने कब बंद कर दिया था......



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