Tuesday, August 7, 2012

दिल की आवाज़ भी सुन


 "तुम मुझे फ़ोन क्यूँ नहीं करती हो? मैं रोज़ इंतज़ार करता रहता हूँ "

वो थोड़ा नाराज़गी से कहता है।

"शुभ मेरे पास कुछ होता ही नहीं बोलने के लिए, क्या बात करूंगी ?"

हैरान होती ऋचा सोचती है ये शुभ्र भी न इतने वर्षों से ये कैसा सवाल दोहराता रहता है |

"अरे बोलने में क्या है वो तो बात से बात निकल ही आती है ना"

"वो तो मैं तुमसे बिना फ़ोन पर किये भी अक्सर करती हूँ? तुम्हे मेरी आवाज़ सुनाई नहीं देती?"

थोड़ा मुस्कुरा कर कहती है | 

"तुम्हारी यही आदत मुझे सख्त नापसंद है। सीधी बात को भी उलझा कर ही बोलती हो"

उसकी नाराज़गी अब भी कम नहीं होती |

"अच्छा नाराज़ मत हो आगे से किया करूंगी, अब तो खुश?"

वो उसके थोड़ा सा सिर उठाते अहम् को सहला देती है | 

"ऐसा वादा तो तुम मुझसे पिछले तीन वर्षों से कर रही हो"

मुस्कुराता हुआ शुभ्र ऋचा का हाथ अपने हाथ में लेता है। दोनों अन्य दिनों की ही तरह समुद्र के किनारे-किनारे टहलने लगते हैं। 

दूर तक.....देर तक.....चुपचाप.......

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