Friday, May 25, 2012

ज़िंदगी के कुछ हिस्से मेरी पकड़ में नहीं आते


करीने से सवंरे बालों वाला उसका चेहरा बहुत ही जाना पहचाना लग रहा था। सावंला तरोताजा चेहरा मानो अभी तक उस पर कोलोन महक रहा हो। बीच-बीच में वो अपनी किताब से नज़रें उठा कर प्लेन की खिड़की के बाहर बादलों को देखने लगता था। रुई के फाहों से बादल और उनके ऊपर उड़ने का अहसास कितना आनंद दे रहा होगा, समझ सकती हूँ। 

अपने कैमरे की सेटिंग को ठीक करते हुए यदा-कदा मैं भी उसकी और देख लेती थी। अथाह जिज्ञासा थी। इतना जाना पहचाना व्यक्ति और ये चेहरा। ये यादाश्त भी न... कभी तो बिना बुलाये वर्षों पीछे की याद दिला दे..... नहीं तो लाख जोर डालने पर भी अपने नाम पते के साथ नदारत रहती है। 

नारी सुलभ लज्जा और संकोच भी अच्छी चीज़ नहीं है। भीतर बेचैनी है पहचानने की, मगर पूछ नहीं सकते। अपनी ये आदत मुझे बिलकुल अच्छी नहीं लगती। परन्तु इतने वर्षों में बदल भी नहीं पाई। 

प्लेन अपनी पूरी रफ़्तार में था। बस अगले आधे घंटे में दिल्ली एयरपोर्ट आ जाएगा ... वो फिर अपनी किताब में खो जाता है और मैं अपने कैमरे की सेटिंग करने में और अन्दर की कसमसाहट में। थोड़ी ही देर में फिर से उसे देखने लगती हूँ या शायद घूरने लगती हूँ।  

तभी झटके से वो अपना चेहरा उठाता है और होंठों को थोड़ा टेड़ा करता हुआ छोटी सी कठोर मुस्कुराहट के साथ मुझे देखने लगता है। 

" क्या जानना चाहतीं हैं आप ?"

"................."   मैं हैरान और चोरी सी पकड़ी जाने के भाव से स्तब्ध। नज़रें फेर कर अपने आप को समेट लेती हूँ और नर्वस होती पर्स में ना जाने क्या टटोलने लगती हूँ। 

" जानना चाहती हैं मैं पहले आपको कहाँ मिला था? कौन हूँ ?"  
बगल की सीट पर बैठी मैं सोच ही नहीं पा रही थी अब क्या.....?

" आप नहीं पूछ पाएंगी फिर मैं ही बता देता हूँ। इत्तेफाक से महिने भर पहले किसी प्लेन से इसी तरह अगल- बगल में बैठ कर हम दोनों दुबई तक गये थे।" आगे बताऊँ फिर क्या हुआ था वाले भाव के साथ मेरी ओर गौर से  देखने लगता है। 

" तब आप इसी तरह खोयी थीं अपनी किताब में और उस वक्त मेरे मन में ये सारे प्रश्न थे"

" ह्म्म्मम्म......"

" खाना खाते समय भी आपने अपना सारा ध्यान अपनी किताब में ही लगाया हुआ था और बेध्यानी में मेरा भी कस्टर्ड खा लिया था"

" आपने मुझसे कुछ कहा क्यूँ नहीं ?" मैं शर्मिंदा होती हुई झट से बोली।

" कहा था ना, मगर तब आपने मुझे आपका सारा खाना खाने का दायित्व सौंप दिया था, और ये भी कहा था। 
खाना बर्बाद करना अच्छी बात नहीं होती है"

वो उसी तरह अपनी टेड़ी व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट को बनाए रखते हुए बोला। मैं इतनी बड़ी बेवकूफी भी कर सकती हूँ विश्वास नही हुआ.......

"तो........"  मैं असहजता के भाव को छिपाती हुई बोली। 

" तो क्या, आप पर मेरे एक कस्टर्ड का उधार है, कब लौटा रही हैं?" 

अब उसके टेड़े होंठ करके मुस्कुराने की अदा हंसी में बदल गई थी। 

ढेरों घबराहट और अति संकोच से असहज होती सपाट चेहरा बनाती हूँ और संगठित भाव ओढ़ लेती हूँ। वो कुछ देर तक किसी उत्तर की उम्मीद में मेरी तरफ देखता है। उम्मीद की गैरहाजरी में वो फिर किताब पढने का उपक्रम करने लगता है और मैं एयर-होस्टेस के लैंडिंग की तैयारी के ऐलान पर अपना सामान समेटने का....... 
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