Tuesday, December 20, 2011

बेगुनाही का दर्द


पहाड़ों की ठंडी मीठी सुबह थी। साफ़ आकाश में खिली हुई कच्ची धूप की तपिश, खूब अदरख की बहुत गर्म मग भरकर चाय और बेसन का खूब घी का हलवा। साथ में थी प्रभा खेतान की पुस्तक 'छिन्नमस्ता' इस से खूबसूरत दिन हो ही नहीं सकता था। ज़माने बाद फुरसतें मेहरबान हुई थीं इसलिए मैं जी भरकर इसका हर लम्हा जी लेना चाहती थी। ये सभी यादें मैं उस वक्त के लिए सहेज कर रखती हूँ जब व्यस्तता दीमाग को संवेदनहीन और दिल को भावुकता रहित करती हमें मशीन सा बना देती है। डीडीहाट के गेस्ट हाउस के लॉन में बैठी मैं पीठ पर पड़ती धूप के सेक का आनंद लेती हुई पुस्तक में खोई हुई थी। तभी कुछ तेज पदचाप सुनाई दिए....

"मैडम ये साहब आपसे मिलना चाहते हैं।" बहादुर कुछ परेशान सा होकर बोला। 

मैनें उन साहब की ओर देखा....उसके चेहरे पर नाम मात्र की भी मुस्कान नहीं थी। उसका बेतरतीब छितरे हुए ना संवारें गए बालों और कुछ दिन की बढी हुई शेव के बावजूद भी उठी हुई नासिका वाला व्यक्तित्व अच्छा था।अभिवादन करना शायद उसे वक्त की बर्बादी लग रही होगी। सपाट चेहरा बनाये मुझे घूरते हुए वे महोदय थोड़े रहस्यमयी लग रहे थे। सोचने लगतीं हूँ 'ये महानुभाव थोड़ा खुशदिल होते तो थोड़ा और अच्छे लग सकते थे।' 

".........." अब बिना कुछ बोले वे अपने दोनों हाथ बाँध कर बड़ी अकड़ वाली मुद्रा बनाते तन कर खड़े हो गए।

"कुछ काम है मुझसे?" मैं ही सहज होती, मुस्कान दबाती हुई पूछती हूँ।

"आप क्या समझती हैं मैं यहाँ बेवजह खड़ा हूँ।"

मैं थोड़ा हैरान होती हूँ। जहाँ तक मुझे याद पड़ता है मैंने ऐसा कोई कार्य नहीं किया था कि लोग मुझसे इस तरह बात करें। बीते वर्षों में इस तरह का ज़िंदगी का ये पहला अनुभव था। ना जाने ऐसा क्या था मुझे उसकी वो झूठी अकड़ भी भा रही थी इसलिए थोड़ा मुस्कुराती हुई फिर पूछती हूँ। 

"कहो क्या कहना है?"

"आप खुद नहीं समझ सकती, दिखती तो आप खासी समझदार हैं।" वो भवों को सिकोड़ता हुआ उसी अकड़ से बोला।खामोश रह कर फिर उसे देखती हूँ और समझने की कोशिश करती हूँ। भोजन के आभाव से दुबलाता शरीर, बदरंग होता पूरी बाहं का टी शर्ट उस पर सीवन खुली हुई आधी बाहं का स्वेटर, पैरों में सेंडल। लगभग दो मिनट तक मौन बना रहा। 

" क्या मदद कर सकती हूँ मैं आपकी?" मैं मौन तोड़ती फिर पहल करती हूँ। 

" मदद आप क्या करेंगी मेरी, मदद तो मैं आपकी करने आया हूँ।" अब तक मेरे धैर्य की बहुत परीक्षा हो चुकी थी। लेकिन उसकी झूठी अकड़ वाले सौम्य व्यक्तित्व ने मुझे उसकी इस गुस्ताखी पर भी नाराज़ नहीं होने दिया। 

"ठीक है जल्दी बताइए क्या कहना है, क्यूँ अपना वक्त बर्बाद कर रहे हैं?" 

"मैं वक्त लेकर आया हूँ, आप अपना वक्त संभालिये। तब भी उस दिन आप जल्दी में नहीं होतीं तो बात आपकी समझ में आ जाती।"

"मेरे पास भी बहुत वक्त है मैं यहाँ छुट्टियां बिताने आई हूँ।" मैं उसकी बात को समझने की कोशिश करती हुई बोली। 

"तब तो आप इस मेहमान को चाय पिला सकती हैं।" कुर्सी खींच कर बैठता हुआ वह खुद ही लड़के को आवाज देकर एक कप चाय का लाने को कह देता है। अब उसकी इस गुस्ताखी से मैं थोड़ा घबरा जाती हूँ और अपना स्वेटर और पुस्तक उठाती लगभग तेजी से भीतर जाने लगती हूँ। पीठ पर जोर की हंसी का स्वर और मिलीजुली कुछ आवाजें सुनकर चौंकते हुए घूमी। 

" डर गई ना आप, यही तो मैं चाहता था।" वो लगभग अट्टहास करता है। 

" माफ़ कीजिये मैडम ये मेरा छोटा भाई है। दो वर्ष हुए गबन का झूठा आरोप लगाकर इसकी महिला अफसर ने इसे नौकरी से बर्खास्त करवा दिया था.....तब से ये थोड़ा सा अपना मानसिक संतुलन खो बैठा है।" देव सिंह ने बताया। अब जोर से सिहरन महसूस करती हूँ.....पता नहीं ठण्ड से या फिर डर से.......


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