Thursday, January 20, 2011

ज़ेर्बेरा के फूल

 दिनभर की व्यस्तता से निबट कर जब मैं घर पहुँचती हूँ तब आदत से मजबूर हो कर बाहर लौन पर ही बैठ  जाती हूँ। एक बड़ा मग चाय का और सुबह से अब तक बासी हो चुके अखबार को चाय समाप्त होने तक पढ़ती हूँ। यही मेरी थकान मिटाने का सबसे सरल साधन है। आसपास की सभी आवाजों और बातों को अनसुना कर देती हूँ। अब तक खीज कर शायद घर के सभी सदस्य मेरी इस आदत के अभ्यस्त हो चुके हैं। अब कोई मुझसे कुछ नहीं कहता......... 


कुछ देर बाद अँधेरे और ठण्ड से विचलित होकर अन्दर जाती हूँ। सभी मुझसे बहुत नाखुश हैं। ऐसा उनके चेहरे के भाव बता रहे हैं। वे मुझे अपरिचित सी नज़रों से देखने लगते हैं। मुझे उन सभी को देखकर उन पर थोड़ी सी दया और ढेर सारा प्यार आने लगता है। कुछ को गले लगाती हूँ पर तब भी गुस्से से कोई मुझसे बात नहीं करता। शीना जो उम्र में मेरे से थोड़ी बड़ी है और पिछले १२ वर्षों से मेरे साथ रहती है , मेरे हर काम में सबसे बड़ी सहायिका और पक्की मित्र साबित होती है। वह मुझसे कभी भी नाराज़ नहीं होती.....कभी भी नहीं। मेरे कान के पास आकर धीमे से कहती है। 

" दीदी अब तक सभी केवल आपका ही इन्तजार कर रहे हैं "

उनकी ओर देखती हूँ तो सभी अपने उम्दा परिधानों में सजे हुए थे। हैरान होकर पूछती हूँ। 

" कही जाना है क्या हमें ?" 

माँ और बाबूजी का हुक्म भरा ऐलान होता है। 

" आज सब लोग खाना बाहर ही खायेंगे "

क्यूँ, कहाँ, कैसे , किधर ......ये सब पूछना मेरी आदत का हिस्सा नही है। चेहरे पर क्रीम लगा कर, बालों पर ब्रश करती हुई सोचती हूँ। एक दिन इस तरह बाहर जाकर खुशियाँ मनाना कितने दिन की खुशियाँ इकठ्ठा कर लेता होगा ? 

खाना खाते हुए सभी बहुत खुश हैं। बहुत हँसते हैं और बहुत सी बातें करतें हैं। मैं भी सब के साथ खाते - पीते  बहुत हंसती हूँ और बातें भी करती हूँ। पर पता नहीं क्यों हंसती हूँ ? और किन विषयों पर बातें होती हैं। 

घर वापस आने पर शीना मुझे एक बड़ा ही खुबसूरत , चिरपरिचित ज़र्बेरा के फूलों का गुलदस्ता देती हुई कहती है। 

" दीदी आज सुबह कोई दे गया था "

अचानक बसंत खिल उठता है, दुनिया बेहद  खुबसूरत लगने लगती है , मैं मुस्कुराती हूँ और इस बार मुझे पता होता है मैं क्यूँ मुस्कुरा रही हूँ। 

ये आदतें भी अजीब होती हैं ...........


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