Saturday, December 17, 2011

मिलन और बिछोह के रंग


चाँद और तारों से ना मिल पाता सूरज
उषा से मिलने की चाह लिए 
पर्वतों के पीछे से नीचे उतरता है
बिछोह और मिलन का ये रंग
अपनी गुलाबी आभा से 
पर्वतों पर गिरी बर्फ और सारे आकाश को 
इस रंग में रंग देता है
गहराता ये रंग कुछ पलों में लुप्त होता 
छोड़ जाता है स्याह अंधकार 
जीवन पर उतरता और चढ़ता 
कोई भी रंग पक्का नहीं होता 
फिर क्यूँ ये सिलसिला कभी थमता नहीं

Thursday, December 8, 2011

आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे


रोज़ रात आकाश को घंटो देखती हूँ
एक टूटते तारे के इंतज़ार में 
दिल के कोने में दबी हुई 
एक दुआ खड़ी है 
वर्षों से 
या रब अब तो कुछ कर 
धकेल दे उसे आकाश से नीचे 
सीधे आकर गिरेगा जब वो मेरे दामन में 
टांग लूंगी तब उसे कमरे की छत पर
 नज़रों के सामने दिल के करीब 
उसकी रोशनी में दमकती
मुस्कुराती जगमगाती
प्रेमासक्त होकर
लिखूंगी   
अहसासों से भरी 
हर दिन एक नई नज़्म