Friday, October 28, 2011

Dedicated to that care n concern


उस दिन कुछ विशेष करने को था नहीं, सुबह से ही अजीब सी उदासी घेरे हुए थी।  शनिवार वैसे भी विदेशों में बड़ा सुस्त दिन होता है। चाय समाप्त करके ओर सेंडविच हाथ में लिए ही अपने अपार्टमेंट से नीचे उतर आई थी। अपनी बोरियत दूर करने के लिए मुझे दूर तक चलते रहना और रास्ते भर कुकम्बर और चीज़ सेंडविच कुतरते रहना अच्छा टाइम पास लगता है। 

हर मूड के लिए मेरी कुछ ख़ास जगह बन जाती हैं ओर उन जगहों की पुनरावृत्ती मुझे उस मूड से काफी हद तक उबार भी लेती है। कुछ देर बाद मैं हरी घास और रंग-बिरंगे फूलों से सजी लेक के किनारे लगी बेंच पर बैठ गई थी। लेक में बतखें पूरी स्वछंदता से तैर रही थीं।

पार्क में छोटे-छोटे गुलाबी सफ़ेद प्यारे से बच्चे भी खेल रहें थे। मज़ाक में एक दिन किसी हिन्दुस्तानी मित्र से मैंने कहा। "ये अंग्रेज बच्चे इतने साफ़ सुथरे और प्यारे से कैसे होते हैं?" वो भी शरारत से आँख दबाता हुआ बोला "उनकी मम्मियां भी तो वैसी ही होती हैं"

मुझे इन गोलू से, डाइपर से उठे हुए  हिस्से को मटकाते हुए, बतख की तरह चलते, लुढ़कते, उठते बच्चे, बड़े प्यारे लगते थे। उनके पास जाकर उनसे बातें करती, सहलाती, पुचकारती हूँ, तब वो खिलखिलाते, मचलते, खुशी से किलकारियां भरते मुझे और अपने आप को पार्क की रेत से नहला देते थे। बीच-बीच में पानी पर तैरते जहाज़ होर्न बजाते शोर करते साइड में खड़े मुसाफिरों को लेने आ जाते थे और उसमें सवार लोग हम जैसे तट में बैठे लोगों को हाथ हिलाते, मुस्कुराते आगे बढ़ जाते थे।

मन तब भी नहीं बहल पाया तो वापस घूम कर हौलीहौक की सुर्ख लाल फूलों से लदी डाली के नीचे हरी घास पर आकर बैठ गई। जुलाई के महिने में भी स्विट्ज़रलैंड के लुसेर्न की बर्फीली ठंडी हवा में मुझे सूरज की तापिश महसूस नहीं हुई और कुछ देर बाद अचानक ही बारिश की फुहारें भी शुरू हो गयीं। उसी तरह भीगते हुए मैं अपनी सोचों को आकाश की ऊंचाई तक पहुंचा देती हूँ। तभी कंधे पर किसी के हाथों का स्पर्श महसूस होता है।

"What the hell..... तुम यहाँ पर क्या कर रही हो?" वो मेरे सर के ऊपर छाता करता हुआ बोला।

"बैठी हूँ...... सोच रही हूँ आज इस पेड़ की सारी पत्तियां गिन दूँ कैसा रहेगा?" मैं मुस्कुराकर कहती हूँ।

"इसे बैठना नहीं कहते, अपने आप को सब से दूर रख कर छुपना कहते हैं, you mad girl.... सब तुम्हारा उधर सेटरडे गेदरिंग में इंतज़ार कर रहे होंगे और एक तुम हो। "

"एलेक्स तुम जानते हो ना मुझे पार्टी और भीड़ में रहना अच्छा नहीं लगता। "

एलेक्स अच्छी कद-काठी का, हमेशा हरी -वरी में रहने वाला, थोड़ा बडबोला, हाजिर जवाब, जल्दी गुस्सा करने वाला मगर बहुत ही कैरिंग इंसान था। वैसे वो मुझे कोई खास पसंद नहीं करता था क्योंकि मैं उसकी कभी कोई बात जो नहीं मानती थी।

"यु सिली गर्ल, कल तुमने वादा किया था तुम वहाँ आओगी। "

"अब अंकल सेन्द्रो और एमिला आंटी के सामने क्या कहती? उन सभी से कई बार मिल चुकी हूँ ना। तुम जानते हो न एलेक्स अक्सर काफी, वाईन, बीयर, सिगरेट, केक, सुगन्धित मोमबत्तियां आदि की मिलीजुली महक से मेरा सर चकरा जाता है। "

"नो वे..... अभी चलो मेरे साथ। " मेरा हाथ पकड़ कर वह मुझे लगभग खींचता सा है।

"देखो एलेक्स तुम पहुँचो.....मैं झटपट कुछ फोटो क्लिक कर के ३० मिनट में पहुँचती हूँ हम्मम्। " परन्तु मैं उसे बहलाने की कोशिश में कामयाब नहीं हो पाती हूँ।

"कैसा रहेगा,  इफ आई विल हिट ओन यौर हेड? तुम सीधी बात करना तो जानती ही नहीं हो। वाई डोंट यु बिहेव लाइक एन ओर्डीनेरी गर्ल?"

मेरे ज़ोर से हंस देने पर वो और भी गुस्से में आ जाता है। मैं जल्दी से अपना बैग उठाती हूँ। मुझे ओल्ड टाउन जाना था। मित्रों के लिए कुछ सोविनियर और गिफ्ट्स खरीदने थे।

वो मेरा हाथ पकड़ कर मायूस होकर कहता है -" सो कल वापस इंडिया जा रही हो?"

"..........."

"मिस करोगी मुझे?" वह प्रश्नवाचक दृष्टि से मुझे देखता है।

"कह नहीं सकती, कुछ काम होगा तो कहूंगी।" मैं हंस देती हूँ। मित्र लोग कहते हैं वो गज़ब का फ्रेंड इन नीड है....... और मैं... बहुत जरुरत होने पर भी किसी से मदद लेना मुझे बेहद संकोच से भर देता है।

" फ़ोन करोगी ?"

"नहीं.....मेरा कितना बड़ा बिल आ जाएगा। " फिर से उसे छेड़ती हूँ। मुझे मेरे आड़े-टेड़े जवाबों से मायूस हो जाते लोगों पर बहुत दया आ जाती है, और ढेर सारा प्यार भी......इतने संजीदा होने से भला दुनिया चलती है क्या?

"अगर मैं फोन करूँ तो पिक तो करोगी ना?" वो अपनी ही रौ में आगे बोलता है।

"बहुत ज्यादा चांसेस हैं ना उठाऊं, रोज- रोज क्या बात करेंगे हम?" वो मेरे थोड़ा और करीब आ जाता है। अब उसका मस्क डीओ तेजी से महकने लगता है।

"तुम्हे अपने आप को ठगना बहुत अच्छा लगता है ना? पता नहीं किस झूठे भरम में जीती हो। इससे ज़िंदगी आसान लगने लगती होगी,  है ना?"

"..............."

"कभी फुर्सत में उन लोगों के बारे में सोचना जो तुम्हे प्यार करते हैं। तुम्हारे हर दुःख-सुख में तुम्हारे साथ बने रहना चाहते हैं, और तुम्हारी केयर करना पसंद करते हैं......इतना तो कर पाओगी ?"

"हाँ ये ठीक रहेगा एलेक्स, ये मैं जरुर करूंगी, वादा। " भावुकता को अच्छी तरह सँभालते हुए थोड़ा बेफिक्री से कह देती हूँ। वो जल से भरे बादल की तरह मुझे देखता है और पार्टी में आने की याद दिलाता हुआ चला जाता है। मैं आँखों में नमी को महसूस करती हूँ। क्योंकि जानती हूँ कुछ घंटों के बाद मुझे इंडिया वापस चले आना था और उससे ये ज़िंदगी की आखिरी मुलाकात साबित होगी। दो दिन बाद उसे भी हमेशा के लिए बड़ी जिम्मेदारी सँभालने न्यूयोर्क चले जाना था। उसके बाद एक बेहद साफ़ दिल का कैरिंग इंसान केवल एक याद बनकर रह जायेगा........जानती हूँ मैं।

इंडिया में लैंड करते ही सबसे पहला फ़ोन उसी का आ जाता है......जिसे मैं चाह कर भी नहीं उठाती हूँ। वो मेरी भीगी आवाज़ को झट पहचान जो लेता है। फिर शोर करता हुआ एस एम् एस आ जाता है।

"बने रहना हमेशा "

"रिगार्ड्स एलेक्स"


Friday, October 14, 2011

अंतरात्मा से साक्षात्कार ( नारायण स्वामी आश्रम )

चंद रोज़ पहले धारचूला, पोस्ट ऑफिस कैलाश, जिला पिथोरागढ़ में स्थित नारायण स्वामी आश्रम में दुबारा दर्शन करने का सौभाग्य मिला वहाँ पहुँचते ही सर्वप्रथम मुलाकात वहाँ की व्यवस्थापिका एवं ट्रस्टी सेवा निवृत प्रधानाचार्य ) द्रौपदी गर्बियाल जी से हुई। 

मुझे देखते ही प्रसन्नचित होकर झट से बोलीं - " तो नारायण ने आपको इतनी जल्दी फिर बुला ही लिया, वे प्रेमी जनों को एकत्रित करते ही रहतें हैं।" इस बार भजन मंडली भी आई हुई है, संध्या समय आप सभी को खूब आनंद आयेगा। "  इसी वर्ष मई माह में नारायण आश्रम में मेरा पहली बार आना हुआ था।     



कुछ वक्त द्रौपदी जी के सानिध्य में ही बिताया। ढेर सारी बातें, अनुभव, उनका नारायण स्वामी जी के साथ बिताये पलों का वर्णन सुना और आनंदित होती रही। मेरे मन में उम्र के इस दौर (८० वर्ष ) में पहुँच गए व्यक्तियों के प्रति विशेष स्नेह व आदर होता है। उनके अनुभव व ममत्व से लाभान्वित होना आनंदित कर देता है। 

बातें करते हुए अचानक बीच में बोल उठीं। " हम तुम बच्चों को क्या दे सकते हैं यहाँ पर।" मैंने उनके अति प्रेममयी स्पर्श से भाव विभोर होकर कहा -"जो स्नेह और ममता आप जैसे व्यक्तियों से मिलती है, उसका कोई मोल नहीं है। अपने आप को बहुत भाग्यशाली समझती हूँ कि जाने -अनजाने में आप जैसे निस्वार्थ समाज सेवी, 'खुद के लिए जिए तो क्या जिए' जैसा भाव रखने वाले महान विभूतियों के संपर्क में आ ही जाती हूँ। "




मुझे उनका भावुकता भरा चेहरा उस वक्त बेहद मासूम लगा, बच्चों जैसा........वैसे अपने वक्त में वे बहुत ही अनुशासन प्रिय एवं शख्त प्रधानाचार्य रही होंगी। बातों के बीच में आये कुछ प्रसंगों से मुझे ऐसा लगा। निस्वार्थ भाव मन में आते ही इंसान का ह्रदय कितना कोमल हो जाता है। 

दोपहर के भोजन का समय हो गया था। कोई सज्जन बुलाने आ गये। फिर से वही स्वादिष्ट अतिरिक्त प्रेम से परोसा गया मीठा भोजन। फिर कुछ देर बाद हम ऊपर पहाड़ियों पर घूमने गए। दूर दूर तक बुग्याल और जंगली फूलों की बहार एवं खुश्बू फ़ैली हुई थी। अचानक काले बादल घिर आये और बारिश शुरू हो गई। सो हम नीचे आश्रम वापस आ गए। इस बार आश्रम रंग-बिरंगे फूलों से सजा हुआ था। 


शाम ६ - ८ बजे तक गुजरात एवं अन्य जगहों से आये भक्तजनों से शानदार, कर्णप्रिय एवं मधुर भजन सुने।रात के भोजन के बाद फिर से खूब देर तक बातें की। तभी द्रौपदी जी ने बताया की कल दिन में वापसी के दौरान धारचूला के ही रिमझिम गावं में होने वाले कण्डाली महोत्सव जरूर देखतें हुए जाएँ। ये महोत्सव १२ वर्ष में एक बार मनाया जाता है। 


सुबह ६ बजे चाय की आवाज़ पर जब आँख खुली। चिड़ियों का अलग-अलग तरह का कलरव था। सुबह बहुत ठंडी थी। मगर आँख खुलते ही सामने खिड़की पर नज़र गई तो मानो यहाँ पर आना सार्थक हो गया। हिमाच्छादित पहाड़ियां और उस पर गिरती सूरज की पहली किरण की गुलाबी आभा। साक्षात् कैलाश दर्शन जैसा सुख। इससे खूबसूरत भी कोई सुबह हो सकती है क्या?

गहरे ध्यान की अवस्था में कैलाश दर्शन किए। उसके बाद प्रसाद स्वरूप नाश्ता किया और द्रौपदी जी व अन्य साथियों से जल्दी ही फिर मिलने का वादा करते हुए भावुक विदा ली।  



Monday, October 3, 2011

वो आवाज़ मुझ तक पहुँच जाती है


रात भर बादल बरसते रहे, गरजते रहे और रह-रह कर बिजली चमकती रही। सुबह तक उनकी लयात्मक लोरी के साथ मैं सुकून की नींद सोई हुई थी। 

रोज़ सुबह बाहर से चिड़ियों का कलरव, सूरज की प्रथम किरणे, चीड़ और देवदार की मिली जुली खुश्बू से महकती स्वच्छ हवा खिड़की पर लहराते रेशमी पर्दों से छनकर भीतर आती और बेझिझक कम्बल से बाहर उघड़ आये ठण्ड से सिकुड़ कर सोये बदन को छूने की प्यारी गुस्ताखी करतीं हैं। मैं आँख खुलते ही इन मीठे अहसासों को संजोती नरम कम्बल का मोह नहीं छोड़ पाती हूँ। मैं फिर से कम्बल को मुँह तक ढक लेती हूँ......

पहाड़ों की सुबह बेहद खूबसूरत होती है, और यही वह अहसास है जो मुझे अक्सर यहाँ खींच लाते हैं। महानगरों में शोर, गर्मी, उमस और आसपास हरियाली के बदले इमारतें दिखतीं हैं।  इन सब के बीच मैं कभी सुकून महसूस नहीं कर पाती हूं। 

आज की सुबह भी उतनी सुन्दर थी। ६ बजे सुबह, आज साथ में सुनाई दिया बच्चों का संगीतमय सम्वेत स्वर..." वैष्णव जन तो तेने कहिये, पीर परायी जाने रे....." जब तक आलस छोड़ती समझ पाती कि ये  रहा है ?तो अचानक याद आया आज २ अक्टूबर है। गांधी जयन्ती। शाल लपेटा, कैमरा उठाया और लगभग भागती हुई नीचे उतर कर लॉन पर आ गई। तब तक थोड़ी देर हो चुकी थी..मेरे हिस्से में आया केवल गीत, नारों का ऊंचा स्वर और पेड़ों के झुरमुट के पीछे से हल्की सी बच्चों की झलक.......

अब याद आने लगा उत्तराखंड में बीता अपना बचपन और बाल मित्रों के साथ इसी तरह देशभक्ती के ज़ज्बे से ओत-प्रोत गीत और नारेबाजी करना......ये यादें अब व्यथित कर देती हैं और थोड़ा भावुक  भी। ये वक्त हमारी सुविधानुसार वहीं पर थम क्यूँ नहीं जाता, जहाँ हम इसे कुछ पलों के लिए रोक लेना चाहते हैं। 

वापस पलट कर अब लॉन पर लगे झूले में बैठ जाती हूँ। कोई न कोई चाय दे ही जायेगा.......फिर आज के आगे के सफ़र की तैयारी करूंगी। बचपन की यादों से आगे बढ़ती हुई सोच, अब आगे बढ़ती हुई ज़िंदगी के कई पड़ाव पार करती हुई आज पर आ टिकती है। वैसे आज भी उतना ही सुन्दर है........मनचाहे हमसफ़र, मनचाहे कार्य, स्नेही मित्र, प्यारी बातें, यादें, मुलाकातें....सभी कुछ तो है। 

" पहाड़ों से टकरा कर आवाज़ की जो प्रतिध्वनि सुनाई देती है मुझे / वो तुम्हारे दिल के कोने से निकलती है ये मैं जानती हूँ........"