Friday, September 9, 2011

तब उम्र कुछ साल पीछे खिसक जाती है

जब भी उसे मौका मिलता है वो नैनीताल जाना पसंद करती है, हर कोना जाना पहचाना.....यादों से सराबोर......वर्षों पुराने उस छोटे से सुकून भरे रेस्तरां की कोने वाली कुर्सी जैसे वहाँ उसी के लिए ही रखी हो..खिड़की से बाहर खिला हुआ मौसम और सैलानियों की चहल- पहल, ताल में तैरती हुई बतख नुमा नाव और दूर स्वच्छ आकाश में सिंदूरी शाम की लालिमा से लाजमई यौवना सा शर्माता दिखता ताल,अदभुत नैसर्गिक सौन्दर्य, उसे इस रंग को डूबते सूरज के साथ धीरे -धीरे लुप्त होते देखना और फिर चमकते चाँद के साथ रात में तब्दील हो जाना ढेरों खुशियाँ दे जाता है.....


" मैडम एक चाय और ले आऊं, ढेर सारी अदरख और चीनी वाली?"

हैरान होकर उस आवाज की ओर देखती है.......कोई नया ही चेहरा है.......

" तुम्हें कैसे पता मुझे ऐसी चाय चाहिए? "

थोड़ा हिचक और संकोच से कहता है-" वो साहब ने कहा - " मैडम अँधेरा होने के बाद ही जायेंगी यहाँ से, तब तक उन्हें एक कड़क चाय और दे आ, खूब अदरख और चीनी वाली"

दीमाग पर बहुत ज़ोर देने पर भी उन बेतरतीब पेंट -शर्ट वाले, उम्र में थोड़ा बड़े और गंभीर से दिखने वाले, कहीं देखा है इन्हें जैसे, खाना जिनके लिए बहुत महत्वपूर्ण नहीं होता किस्म के, आकर्षक से साहब को वो पहचान नहीं पाती, जो अब अपना पूरा ध्यान उस दिन के अखबार में लगाये हुवे थे..........

अति हैरान होती ओर उत्सुकता वश बहुत सी हिम्मत और थोड़ा संकोच के साथ लड़के से कहकर उन्हें अपनी टेबल पर आमंत्रित करती है....जानने को बेचैन....कैसे ये उसकी चाय का स्वाद जानते हैं?.......
वही से वो उसकी तरफ देखतें हैं फिर धीरे से उठकर अखबार के साथ ही उसके सामने आकर बैठ जाते हैं ..
" जी नमस्कार" वो हल्की संकोचित मुसकुराहट के साथ कहती है........
"..........."
उत्तर ना पाकर थोड़ा असहज हो जाती है....
" यहाँ पर से अस्त होता सूरज और ताल पर गिरती उसकी रंगत बहुत सुन्दर दिखती है ना?...."
" हो सकता है"
" क्यूँ आपको प्रकृती से प्रेम नहीं?"
" अखबार पढ़ती हो? भ्रष्टाचार और राजनीतिक उठा-पटक......."
" जी माफ़ कीजिए.....क्या रखा है इन सब में ...रोज ही तो अखबार इन सभी बातों से अटा-पड़ा होता है .."
" तुम जैसे पढ़े लिखे लोग मुंह फेर लेते हो तभी तो देश का ये हाल है.." भवों को सिकोड़ कर उसी सपाट चेहरे के साथ कहते हैं.....
"..........."
बोझिल वातावरण में अक्सर उसका दम सा घुटने लगता है.....सो झट- पट माहौल को सहज और हल्का करने के लिए कहती है -" क्या आपको ऐसा लगता है की यहाँ पर चाय के साथ मुस्कुराने के ज्यादा पैसे लगते हैं?"
" .............."
उत्तर की प्रतीक्षा करती वो भी चुप ही रहती है.....या फिर समझ नहीं पाती अब क्या बोले?
कुछ देर बाद सोचते हुवे से.. बोलते हैं - "तुम बिलकुल नहीं बदली.....आज भी वैसी ही हो.......माहौल में तनाव और बातों में गंभीरता आने नहीं देती"
ढेरों आश्चर्य लिए लगभग ज़ोर से पूछती है....."आप कब से जानते हैं मुझे.....?"
"................"
" जी आप बताएँगे हम पहले कहाँ मिले थे  ?"
"................."
बिना उसकी बात का उत्तर दिए, अखबार को टेबल के सीने में रख देते हैं.......नज़र भर कर उसकी और देखते हुवे चले जाते हैं...जिसका वो कोई अर्थ नहीं निकाल पाती.........

वो ढेरों मरी हुई यादों को जीवित करने लगती है.......अदरख की मीठी चाय से साम्य बैठाती हुई बातें......उसका मन कैसा- कैसा हो जाता है........
यादों की गर्त में पहुँच कर कई साल पहले तक की सभी यादों को भली भांती टटोलती है.....बहुत सोचने पर भी कोई उम्मीद नहीं दिखती........

पर्स में रखे मोबाइल की आवाज़ भी शोर लगने लगती है........
" दीदी कहाँ रह गयीं आज ....क्या अभी तक आपका आज का सूरज अस्त नहीं हुआ?"...  शीना थोड़ा मस्ती और चिंता से कहती है........
कुर्सी पर टंगा पर्स और शाल उठाती है.......भारी मन और क़दमों से बाहर निकलती हुई मैनेजर से पूछ ही लेती है - " वो साहब कौन थे.....जो मेरे साथ बैठे थे?"
वो थोड़ा रुकता है......जैसे कुछ समझने की कोशिश कर रहा हो...."अरे बताओ तो में सच में उन्हें नहीं पहचान पाई....."
" जी वो भी अक्सर यहाँ पर आते हैं .....यहाँ कॉलेज में बोटनी के प्रोफ़ेसर हैं .....कम बोलते हैं ..बेहद नेक इंसान हैं "

अब झटके से सोच उसे कई साल पहले अतीत में ले जाती है...
जनवरी के बहुत ठंडे दिन जब सर कंद और जड़ों के बारे में तल्लीनता से पढ़ा रहे थे ...अदरख  एक भूमिगत तना होता है जैसा कुछ.....अति ठण्ड से जमती हुई वो बोल उठी थी.....
" सर उपरवाले ने भी क्या बढ़िया चीज़ बनाई अदरख ....खूब ढेर सारा अदरख और चीनी डालो और कड़क चाय पियो....."

उसके साथ सारी क्लास ठठाकर हंस पड़ी थी...और अति गंभीर मुद्रा वाले लड़कियों के चहेते खूबसूरत सर नाराज होते क्लास छोड़कर बाहर चले गए थे.....
वो कुछ लड़कियों को लेकर सर से माफी मांगने गई थी.......
" सर दुबारा ऐसा नहीं होगा......सॉरी सर...."
"............"
" सर प्लीज्ज्ज्जज्ज्ज़......." उनका सर किताब से ऊपर नहीं उठता.......
" सर वैसे एक बार आप वो बहुत अदरख चीनी वाली कड़क चाय पियेंगे ना......तो आपको मेरी बात की सार्थकता का पता चल जायेगा"
".............."
माफी मिली.....ओर उसके साथ मिला...... जीवन इतना सरल नहीं होता है, और धीर गंभीर बने रहना चाहिए जैसा बहुत लंबा पाठ और बहुत ही छोटी सी ना के बराबर मुस्कान के साथ सर पर प्यार की एक चपत........

अब सब कुछ याद आते ही एक मुस्कान के साथ उम्र कुछ साल पीछे खिसक जाती है............

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