Monday, August 15, 2011

समय तू धीरे - धीरे चल


आजकल कुछ दिनों से समय बहुत मेहरबान है 

प्रेममयी मीठी बातों का उबटन लगा 
हर दिन हर पल महकाता है 

हतप्रभ होकर देखती कह उठती हूँ उससे 
जरा पीछे पलट और ले चल मुझे 
ज़िंदगी के उस मोड़ पर 

जहाँ कुछ यादें और बातें छोड़ आयी हूँ 
आज दोहराना चाहती हूँ 
वो सब कुछ फिर से 

सहारे को हाथ बढाता हुआ हंस कर बोला 
मुझे केवल आगे चलना आता है 
चल सको तो हाथ थाम लो 

मुझे धीरे चलना आता है तुम आगे ही चलो 
गिरते हुवे संभलना भी आता है कहती हूँ मैं 
हो सके तो जरा धीरे चलो 
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