Thursday, July 28, 2011

नज़ारों यूँ ही मुस्कुराते रहना


पता नहीं बादल के ऊपर हूँ या बादल के नीचे
चाँद भी धुंधलके में छिपा कभी नज़र नहीं आया
सब कुछ खोया हुआ सा है
बर्फ के आवरण से ढका हुआ
आजकल अभिव्यक्तियाँ मौन हैं
संवेदनाएं बहुत गहराई में जाकर दब गई हैं
बर्फीली हवाओं से जमती हुई


दूर दूर तक फ़ैली हरियाली
अपने आँचल में खुशनुमा रंग समेटे
बहुत से ख्वाब दिखाती आकर्षित करती हैं
बारिश की हल्की फुहारों से भीगते हुए 
दूर तक चलते रहना अब आदत बन गई है
फूलों की रंगबिरंगी छटाएं हवाओं को महकाती
अहसासों को झकझोरती तरंगित करती हैं


अकेलेपन का अपना रंग है
शांत सुन्दर मगर एक धागा उदासी का लिए हुवे
इसी आलम में सफर शुरू होकर ख़तम भी हो जाता है
सुनहरी धूप और धुंध से लपेट कर
बहुत से विचार और कुछ टुकड़ा यादें संजो रही हूँ
जो बाद में कभी दोहराने पर
उस दिन का मौसम सुहाना कर देती हैं
कुछ सुनहरे पल उस मौसम को समर्पित

Friday, July 1, 2011

इस काश शब्द से प्रेम होने लगा है

काश शब्द से भ्रम की स्थिती बनी रहती है
मालूम है ऐसे ज़िंदगी नहीं जी जाती
कुछ पल आनंद के
बस कैद हो पाते हैं
खुशी और दर्द के क्षणों में लगता
काश इसे अपनों से बाँट पाते
सुख की हर कल्पना भी
इसी काश पर टिक जाती है

काश ऐसा होता सोचते ही कल्पनाओं में
यथार्थ के रंग स्वतः ही भर जाते हैं
कई रंग आपस में मिलकर
सतरंगी आभा रचते हैं
प्रेम के सागर में डूबते उतरते
सोच के पंख उस जहाँ तक पहुँच जाते हैं
जहाँ पर इंतज़ार खड़ा होता है
अपने निश्छल प्रेम और
अटूट विश्वास के साथ

देवत्व की सुगंध बांटता
समूचा आकाश आनंदित रहता
तब होंठों पर खिले और
आँखों से छलके प्रेम को महसूसते
आवाज़ की गीली मिठास के साथ
खुशियों के गीत गाते
बाँहों में बाहें डाल अनंत तक चलते
काश वहाँ से वापस लौटने का
कोई रास्ता नही होता
काश ऐसा होता
काश ऐसा ही होता