Wednesday, June 15, 2011

आज भी ये शहर मुझे अजनबियों की तरह घूरता है

वर्षों पहले 
मैं इस शहर को समझने 
 पहाड़ों से उतर कर समतल में आई थी 
सकुचाते सहमते हैरान आँखों से चमकती दुनिया 
 अलग ही दिखती 
 खुशी और गम के गीत गाती 
फिर जीवन का लम्बा सफ़र तय करती रही 
यहीं पर आत्मविश्वास बढ़ाते प्रेममयी सजाते सहलाते 
कुछ हमसफ़र मिले 
कुछ रिश्ते आज भी डराते हैं 
बुरे ख्वाब से कभी पीछा नहीं छोड़ते  
इनकी लम्बी कहानी आज तक रामायण की तरह 
किश्तों में सुनती हूँ 
होंठों पर लम्बी मुस्कुराहट पहनकर 
घबराहट को छुपाने की भरपूर कोशिश करती 
 चहेरों पर अपनी बातों की प्रतिक्रियाएं ढूढती समझती  
बढ़ जाती हूँ 
उन राहों पर जहाँ ज़िंदगी 
बाहें फैलाये स्वागत करती नज़र आती है 
सिमट जाती हूँ फिर उन हसीन वादियों के दामन में

Wednesday, June 1, 2011

करोगे याद तो हर बात याद आएगी


उस दिन सूरज की किरणों के जगाने से पहले ही मेरी नींद उचट गयी थी। वातावरण में पिछली रात की बारिश की ठंडक समाई हुयी थी। मेरा मन चलते चले जाने का था। बहुत दूर उन सर्पिलाकार सड़कों पर जो अपने उबड़ खाबड़ रास्तों से जंगल को घेरे रहती हैं। टुकड़े -टुकड़े स्मृतियों को जोड़ते - तोड़ते कभी- कभी निरुद्देश्य चलते रहने में भी बहुत आनंद आता है। 

तब समय मेरी मुट्ठी में था, मन प्रसन्न था और सोच स्वतंत्र थी। ज़िंदगी इतनी रहम दिल भी हो जाएगी ऐसा मैंने कभी सोचा भी नहीं था। 

यहाँ गौरय्या बहुत दिखाई दीं। मेरी बाल सखा, बहुत बातें करती थी में इनसे। आज भी इनसे एकालाप ठीक ही रहा। मुझे टुकुर- टुकुर देखती थीं जैसे सब कुछ समझ रही हों। शायद समझ ही रही थी तभी तो देर तक बिना डरे वे मेरे सामने बैठी रही।  

फूलों और जंगली घासों की मिली -जुली खुश्बू से महकती हुई मैं अपनी कल्पनाओं में सुन्दर रंग भरती रही। जानती हूँ ज़िंदगी कल्पनाओं के सहारे नहीं चलती। यथार्थ से रूबरू होना ही पड़ता है। घटनाओं और अनुभवों से सराबोर ये ज़िंदगी अब और भी अच्छी लगने लगी है। 


पगडंडियों पर नज़र रख कर चलने वाली मैं आज सर उठा कर चीड़ के ऊंचे, लम्बे पेड़ों के पीछे से झांकते हुए साफ़, नीले आकाश को देखती हुई चल रही थी। मनचाहा प्राप्त होने पर आत्मविश्वास हमेशा सर क्यों ऊंचा कर लेता है ? जबकि इस भंगिमा से मैं हमेशा कतराती हूँ। चुपचाप सर नीचे कर के चलने से लगता है दुनिया से बेखबर हम पूरी तरह अपने ही साथ हैं। और अपना साथ सबसे सुन्दर साथ है। ना हम पर ना हमारे विचारों पर, कहीं पर किसी का कोई हस्तक्षेप नहीं।  

अचानक एक बड़े से नुकीले पत्थर से टकराती हूँ। लगभग गिरती हुई सहारे को तलाशते हाथों में पेड़ से झूलती शाखाएं आ जाती हैं। गिरने से बच गई थी। शायद उस दिन सभी की मिली- जुली साजिश थी मुझे खुश रखने की। झिंगुरो की आती -जाती आवाजों के साथ टूटी हुई सोच की कड़ी फिर जुड़ जाती है। 

ज़िंदगी को पलट कर देखती हूँ। ज़िंदगी जीने के लिए बहुत थोड़े से लोगों की जरुरत पड़ती है और केवल उन के अहसासों के साथ भी समय सुन्दर बीत जाता है। 

अचानक सर के ऊपर से एक चील ज़ोर की आवाज़ करती हुई निकली। सहम कर चारों तरफ देखती हूँ। यदा -कदा कुछ सर उठाते सवालों के हल खोजते हुए बहुत दूर निकल आई थी। सूरज का ताप भी बढ़ता ही जा रहा था। अब वापस घर की ओर जाने लगती हूँ। 

फिर वही रास्ते, जीवन के अलग-अलग मोड़ों पर मिलते दुख-सुख का हिसाब- किताब। सब यादों में बरसाती बादलों की तरह घुमड़ता रहता है। जीवन की गणित भी कितनी मजेदार होती है। कुछ सवाल पल भर में ही हल हो जाते हैं, ओर कुछ हमारे साथ ही अपनी तमाम ज़िंदगी का सफ़र तय करते हैं .......