Tuesday, December 28, 2010

ज़िंदगी मेरे घर आना ज़िंदगी



सुरमयी शाम के कुछ पल 
आज जीने का मन था यहाँ
जहाँ दरिया की गहरी चुप्पी
जम कर हिमनद बन गयी
उन अहसासों की तरह 
जो कभी बहा करते थे 
रूमानियत से 

पीठ पेड़ पर टिका घंटों बैठती
तब सोच के पंख बहुत बड़े हो जाते 
ज़िंदगी परत दर परत खुलती
आकाश छू लेने की चाहत 
तीव्र हो उठती 
हाथ थामते साथी का    
पहुँच जाती उस मंजिल तक
जिसे पाने का ख्वाब 
कभी जग पड़ा था
अनजाने में 

Sunday, December 12, 2010

ज़िंदगी तुझसे शिकायत कैसे हो भला



नयी उम्मीदें जगाते उगते हुए सूरज से 
फिर मिलने की चाह बढ़ाती ढलती लालिमा से 

जीवन से भरपूर आती हुई लहरों से 
नई मंजिलें तलाशते छूटते दूर किनारों से 

जिंदादिली से भरपूर रंगबिरंगे शोर से 
दिलोदिमाग को झकझोरती अज़ब शांती से 

मुस्कुराते बाहें फैलाते पूर्णिमा के चाँद से 
सन्नाटे से बातें करवाते अमावस के अँधेरे से 

मदहोश सुकून देते जंगलों के आकर्षण से 
जगमगाते बाज़ार मधुर संगीत की रौनक से 

शिकायत अब कैसे और क्यूँ हो मुझे 
 जब ज़िंदगी कुछ ऐसा रिश्ता है तुझसे मेरा