Thursday, November 18, 2010

ऐ चाँद जरा सो जा


रात का सर्द चाँद
पेड़ों के बीच से झांकता
रूमानियत सिखा जाता
ठंडी रात के स्पर्श से
कंधे उचका कर
शाल कस कर लपेटती हूँ
बोझिल पलकें बंद होने का गुनाह
नहीं कर पाती
तू थक कर सोता क्यूँ नहीं
सकुचा कर चाँद से पूछती हूँ
अपने यौवन पर गर्वित हो वो
मुस्कराहट का उत्तर थमा देता है
छत से नीचे उतरते हुवे
पलट कर फिर आखिरी बार
देख लेती हूँ उसे
सुबह का नया सूरज
सहज ही भुला देता है
पिछली रात की बातें
फिर वही सड़कें शोर,दिनचर्या
सोच से माथे पर पड़ती सिलवटें
क्रीम की परतों के नीचे छिपा
ना सो पाया थका चेहरा
काजल से बड़ी दिखती आँखों में
ढेर सारे नए आश्चर्य
धड़कन महसूस नहीं होने पर
दिल को टटोलती हूँ
कल रात चाँद के बाजू में
शायद छोड़ आई हूँ उसे

Tuesday, November 2, 2010

देवदार अटल प्रेम का प्रतीक


सुबह की ठंडी, मीठी धूप का आनंद लेने मैं लान पर बाहर आ गयी.....अति ठंडी हवा से चाय की जरुरत एवं तलब पर एक कप चाय का लाने को कहकर लॉन से दूर तक दृष्टि डालती हूँ... चारों तरफ हरियाली का भव्य आँचल उस पर वर्षों से खड़े, खूबसूरत देवदार ...सीधे अटल सीना तान कर....जैसे सच्चाई की जीत का जश्न मना रहे हों, इनका अनुपम सौन्दर्य मुझे हमेशा ही आकर्षित करता है। 


अनुमान लगाने लगती हूँ जब इसपर बर्फ गिरती होगी तब भी ये इसी शान से बिना विचलित हुए यूँ ही खड़ा रहता होगा ? सुईनुमा पत्तियों वाला इसका विन्यास बर्फ के भार से लदकर थोड़ा झुक जाता होगा। जैसे-प्रकृति के विराट रूप पर मोहित होकर उसके आगे नतमस्तक हो गया हो। तब इसके सौन्दर्य पर चार चाँद लग जाते होंगे......

कठिन पत्थरों को पकड़े,  आँधियों से जूझते, शिलाओं पर खड़े ये निर्भिक आलीशान देवदार। 
बीच - बीच में हिमालय की ठंडी हवा का झोंका बदन में सिहरन ला देता था जिससे मैं ना चाहते हुए भी देवदार के इस आकर्षण से बाहर आ जाती थी। 

मायूसी से टेबल पर रखी ठंडी चाय को देखती......और सोचती हूँ....काश कोई एक कप गर्म चाय का फिर ला देता तो कितना अच्छा होता.........