Friday, August 27, 2010

बहार लिखने का मन था आज












दम तोड़ते रिश्ते बहुत देर डगमगाते हैं

इस कोशिश में सहारा मिले
तो टांग दें ज़ज्बात उस पर
दूर अहम् की चादर ओढ़े उम्मीद
हाथ बांध मुस्कुराती है

अकेला बैठा अहम्
अपनी मजबूरियों के गीत गाता
स्याह पलों में रंगकर
उजाले का इंतजार करता
न होने वाली सहर का

हाथ में हाथ डाले चंद लम्हे
तब दे जाते हैं साथ
बिना पूछे कैसे और क्यूँ
आशाओं के गीत गुनगुनाते
उस पार पहुंचा देते

जहाँ पूर्णिमा का चाँद
मुस्कुराता सतरंगी सपने दिखा
जीने का आधार बनाता
अल्हड़ नवयौवना सा श्रृंगार दे
बहार का नाम सार्थक कर जाता

Friday, August 6, 2010

वो गुलमोहर

















क्रिमजन लहराते फूल
सहेजती आँचल में भरती
ये कैसा रिश्ता है मेरा
गुलमोहर से

प्रेममयी बयार से
यादों को महकाते हुए 
सुर्ख होते हॊठ
मुस्कुराते गीत गुनगुनाते

लहराती डालियाँ इसकी जब 
तन मन का ॠंगार करती
झरते फूलों की इतराहट लिए
महक उठती रूह मेरी

लाज़ से सिमटी
गुलनार होती 
इकसार हो जाती
इन्हीं फूलों के बीच 
मैं भी कहीं