Tuesday, September 28, 2010

अपने देश के बच्चे


















 ( कुछ समय पूर्व ऋषिकेश में गंगा के पावन तट पर ..जीवन के दौड़ भाग से दूर फुर्सत के क्षणों में इन सब से रूबरू हुयी थी )

ये देश के अपने भूखे बच्चे
कुम्हलाये सहमे बदरंग से बच्चे
खाने का ठिकाना ना पहनने की सुध
नादां अनबूझ पहेली से बच्चे

जरा इनके चेहरे की रौनक तो देखो
हर हाल मुस्कुराता ये जीवन तो देखो
हँसी शरारत ये मौज मस्ती
मासूमियत का ये मंज़र तो देखो

ममता के आँचल को तरसते सिसकते
सहारे को इक हाथ ढूंढते झिझकते
गर इक हाथ हम ही हैं बढाते
क्या देश के ये किसी काम ना आते?


Tuesday, September 21, 2010

कलम की ख़ामोशी















वक्त के साथ मेरी कलम
अब खामोश होने लगी
सन्नाटे में शब्द तलाशते
अहसासों की स्याही सूखने लगी
कोरे कागज़ पर मौन जड़कर
लिखना सार्थक कर देती हूँ
रफ़्तार पकड़ते जीवन से टकरा
उपेक्षित दिल कराहता है
वक्त ने ठहाका लगाया
गीत कब निकलेंगे अब
कलम भी तड़प कर बोली
मुझे भी खिलखिलाना है
उत्तर ढूढते बेबस लफ्ज़
जा छुपे ख़ामोशी के पहलू में
तब भीतर की कसक को दबा
सीने से लगा सहला देती हूँ मैं उसे